माहवारी का सबूत मांगने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, 'पीरियड-शेमिंग' रोकने और महिलाओं की गरिमा के लिए बनेंगे कड़े नियम

02:11 PM Nov 29, 2025 | Rajan Chaudhary

नई दिल्ली: हरियाणा की महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी (MDU) में हाल ही में घटी एक शर्मनाक घटना, जिसमें तीन महिला सफाई कर्मचारियों को यह साबित करने के लिए अपने सैनिटरी पैड की तस्वीरें भेजने पर मजबूर किया गया कि उन्हें माहवारी (Periods) हो रही है, ने देश की शीर्ष अदालत का ध्यान खींचा है। इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला लिया। अदालत अब महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य, गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता और निजता के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश (Guidelines) बनाने पर विचार करेगी।

बेंच ने जताई गहरी चिंता

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने शैक्षणिक संस्थानों और कार्यस्थलों पर हो रही 'पीरियड-शेमिंग' की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। जजों ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की हरकतें लोगों की मानसिकता को उजागर करती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों को नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा दायर एक याचिका पर की गई है, जिसमें कोर्ट को बताया गया कि 'पीरियड-शेमिंग' के कई मामले सामने आ चुके हैं और इसमें तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है।

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SCBA की दलील: यह निजता का हनन है

SCBA के अध्यक्ष विकास सिंह और अन्य पदाधिकारी अपर्णा भट व प्रज्ञा बघेल ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि पूरे भारत में लागू होने वाले ऐसे दिशा-निर्देशों की सख्त आवश्यकता है, जो कार्यस्थल पर गरिमा और समावेशिता को बढ़ावा दें। उन्होंने कहा कि हरियाणा की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि देश भर से ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं।

याचिका में कहा गया, "संस्थानों में यह जांचने के लिए कि महिलाओं या लड़कियों को माहवारी हो रही है या नहीं, उन्हें अपमानजनक जांच से गुजारना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन, गरिमा, निजता और शारीरिक अखंडता के अधिकार का घोर उल्लंघन है।" SCBA ने जोर देकर कहा कि महिला कामगारों, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को कार्यस्थल पर सम्मानजनक स्थितियां मिलनी चाहिए। जब वे माहवारी के दर्द या परेशानी से गुजर रही हों, तो उनके साथ अपमानजनक व्यवहार के बजाय उन्हें रियायत मिलनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की मानवीय टिप्पणी

संक्षिप्त सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा और इस मुद्दे को उठाने के लिए SCBA की सराहना की। बेंच ने एक बेहद मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए कहा, "अगर कोई महिला कर्मचारी माहवारी के कारण भारी काम करने में असमर्थ थी, तो वह काम किसी दूसरे कर्मचारी को सौंपा जा सकता था। अगर कोई कह रहा है कि इस वजह से भारी काम नहीं हो सकता, तो इसे स्वीकार किया जाना चाहिए था और किसी अन्य व्यक्ति को तैनात किया जा सकता था।" बेंच ने उम्मीद जताई कि इस याचिका के जरिए भविष्य में कुछ सकारात्मक बदलाव आएंगे।

हरियाणा सरकार की कार्रवाई

दूसरी ओर, हरियाणा सरकार ने कोर्ट को सूचित किया कि इस मामले में जांच शुरू कर दी गई है। सरकार की ओर से बताया गया कि घटना के लिए जिम्मेदार दो व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई भी की जा चुकी है।