भोपाल के केरवा-कलियासोत डैम पर भू-माफियाओं की नजर: NGT का सख्त निर्देश- निजी जमीन भी नहीं बनेगी पर्यावरण विनाश की ढाल, जानिए मामला?

04:34 PM Feb 07, 2026 | Ankit Pachauri

भोपाल। राजधानी भोपाल के केरवा डैम और कलियासोत डैम क्षेत्र में सुनियोजित तरीके से हो रहे अतिक्रमण पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण के साथ कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है। अधिकरण ने साफ कहा है कि भले ही भूमि निजी स्वामित्व में हो, लेकिन यदि वहां की गतिविधियां जलाशय, वेटलैंड या जलग्रहण क्षेत्र को नुकसान पहुंचाती हैं, तो उन पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।

यह अहम मामला पर्यावरण कार्यकर्ता रशीद नूर खान की याचिका पर एनजीटी के संज्ञान में आया। याचिका में आरोप लगाया गया कि केरवा डैम से लगे महुआखेड़ा क्षेत्र में डैम के फुल टैंक लेवल (FTL) के भीतर बड़े पैमाने पर अवैध भराव किया गया है। बताया गया कि 2000 से अधिक डंपरों के जरिए मिट्टी, कोपरा और मुरम डाली गई, जिससे जलाशय का प्राकृतिक स्वरूप बदला जा रहा है।

याचिका के अनुसार इस भराव का उद्देश्य जलग्रहण क्षेत्र को समतल कर भविष्य में कॉलोनियां बसाना, रिसॉर्ट और पक्के निर्माण खड़े करना था- जो सीधे तौर पर डैम के अस्तित्व पर खतरा है।

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संयुक्त समिति की जांच में गंभीर खुलासे

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने अधिकारियों की एक संयुक्त समिति गठित कर जांच करवाई। समिति की रिपोर्ट में सामने आया कि कई स्थानों पर 10 फीट तक ऊंची मिट्टी की परत डाली गई है। इससे न केवल डैम की जल भंडारण क्षमता घट रही है, बल्कि उसकी जल पारिस्थितिकी (Aquatic Ecology) को भी गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।

समिति ने माना कि यदि यह स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में केरवा और कलियासोत डैम का जलस्तर और जलगुणवत्ता दोनों प्रभावित होंगे।

एनजीटी का सख्त आदेश: उल्लंघन पर जुर्माना और कानूनी कार्रवाई

संयुक्त समिति की रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी की भोपाल बेंच ने सख्त आदेश जारी करते हुए चेतावनी दी है कि आदेशों की अवहेलना करने वालों पर भारी पर्यावरणीय मुआवजा, जुर्माना और कानूनी कार्रवाई तय है। अधिकरण ने यह भी कहा कि पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई दोषियों से ही कराई जाएगी।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन तिवारी ने प्रभावी ढंग से तर्क रखते हुए अतिक्रमण को डैम के लिए “दीर्घकालिक खतरा” बताया।

पेट्रोलिंग अनिवार्य, सीमांकन तय समय में पूरा करने के निर्देश

एनजीटी ने जल संसाधन विभाग को निर्देश दिए हैं कि वह महीने में कम से कम दो बार केरवा और कलियासोत डैम क्षेत्र में पेट्रोलिंग करे, ताकि अवैध डंपिंग और निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जा सके।

साथ ही, राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को आदेश दिया गया है कि वह दो महीने के भीतर केरवा डैम के प्रभाव क्षेत्र (Influence Zone) की पहचान और स्पष्ट सीमांकन पूरा करे।

अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि 33 मीटर के बफर जोन का उल्लंघन करने वाले भू-स्वामियों के खिलाफ कार्रवाई पूरी तरह विधिसम्मत है और उन्हें हर हाल में अवैध मलबा हटाना होगा।

कलेक्टर और पंचायतों को सौंपी गई अहम जिम्मेदारी

एनजीटी ने जिला कलेक्टर और पंचायत अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे कैचमेंट क्षेत्र से अवैध कब्जे हटाने की प्रक्रिया तत्काल शुरू करें। इसके साथ-साथ इस क्षेत्र में पेड़ लगाने, मिट्टी संरक्षण और जलस्रोतों की पुनर्बहाली का कार्य भी सुनिश्चित किया जाए, ताकि डैम की उम्र और उपयोगिता बनी रहे।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी सतत निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे भविष्य में किसी भी तरह की पर्यावरणीय अनदेखी पर तुरंत कार्रवाई हो सके।

राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी पर जोर

अपने आदेश में एनजीटी ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केरवा डैम केवल सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि भोपाल के लिए पेयजल का एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक स्रोत भी है।

अधिकरण ने दो टूक कहा कि पर्यावरण संरक्षण राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है और प्रशासन वित्तीय या प्रशासनिक कठिनाइयों का बहाना बनाकर इससे बच नहीं सकता।

अतिक्रमण से पैदा हो रहे खतरे- भविष्य का जल संकट?

एनजीटी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि केरवा डैम के जलग्रहण क्षेत्र में हो रहा अतिक्रमण केवल अवैध निर्माण का मामला नहीं, बल्कि यह भविष्य के गंभीर जल संकट की चेतावनी है। अधिकरण ने कहा कि जलग्रहण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मिट्टी भरने और भूमि के समतलीकरण से डैम की प्राकृतिक जल संग्रहण क्षमता लगातार घट रही है, जिससे बरसात के मौसम में आने वाला पानी भी लंबे समय तक नहीं रुक पा रहा। केरवा डैम कोलार, बैरागढ़ और आसपास के कई इलाकों के लिए प्रमुख जल आपूर्ति स्रोत है, ऐसे में यदि अतिक्रमण और अवैध गतिविधियां इसी तरह जारी रहीं तो आने वाले वर्षों में इन क्षेत्रों को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। एनजीटी ने यह भी चिंता जताई कि जलग्रहण क्षेत्र में पक्के निर्माण, बंगले और रिसॉर्ट बनने से स्थानीय जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है, जिससे पक्षियों, जलीय जीवों और वनस्पतियों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। इसके साथ ही नदियों और नालों के प्राकृतिक बहाव में अवरोध पैदा होने से डैम तक पानी की आवक

डैम बचेगा, तभी शहर बचेगा!

एनजीटी का यह आदेश न केवल केरवा-कलियासोत डैम के लिए, बल्कि देशभर के जलाशयों के संरक्षण के लिए एक नजीर माना जा रहा है। अधिकरण ने साफ संदेश दिया है कि विकास के नाम पर जलस्रोतों का विनाश किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।