कर्नाटक: मादेश्वरा मंदिर उत्सव में जातिगत अपमान, चंदा लेने के बावजूद दलित बस्ती में शोभा यात्रा ने नहीं किया प्रवेश!

06:23 PM May 22, 2026 | Geetha Sunil Pillai

मैसूरु- जिले के कृष्णराज नगर तालुक के दूरदराज गांव माचल्ली में दलित समुदाय के सदस्यों ने मादेश्वरा मंदिर और देवता की शोभा यात्रा को लेकर गंभीर छुआछूत तथा जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए हैं।

स्थानीय निवासियों के अनुसार गांव में बहुत पुरानी परंपरा रही है कि भगवान मादेश्वरा की वार्षिक जात्रा के दौरान बैलों के जुलूस को हर घर और हर बस्ती में ले जाया जाता था। पिछले सप्ताह हुई जात्रा के दौरान दलित बस्ती में इस परंपरा का पालन नहीं किया गया। दलित समुदाय का आरोप है कि उन्हें पूजा करने के लिए अपमानजनक और असमान तरीके से मजबूर किया जाता है। उनके त्योहार समाप्त होते ही मूर्ति को तुरंत हटाकर ले जाया जाता है, जिससे उन्हें देवता की पूजा का मौका ही नहीं मिल पाता।

दलित मोहल्ले वासियों ने बताया कि उन्होंने दो-तीन घंटे तक इंतजार किया, लेकिन उनके लिए कोई पूजा का इंतजाम नहीं किया गया। मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए गए और लोग चले गए। एक सदस्य ने कहा, “यह 21वीं सदी में भी हो रहा है, जो बेहद दुखद है।” समुदाय का आरोप है कि यह हर साल होता है। जुलूस कभी उनकी बस्ती में नहीं आता और अगर वे मंदिर जाते हैं, तो उन्हें दूर ही खड़े रहने पर मजबूर होना पड़ता है।

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समुदाय ने सामाजिक कल्याण विभाग और स्थानीय अधिकारियों पर भी आरोप लगाया है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद कोई अधिकारी गांव नहीं पहुंचा है।

दलित समुदाय के अनुसार इस बार गांव के बड़ों ने एक सार्वजनिक सभा में सभी के सामने सहमति जताई थी और वादा किया था कि दलित बस्ती में भी पूजा का पूरा इंतजाम किया जाएगा। इस वादे पर भरोसा करते हुए हर दलित परिवार ने पूजा के लिए हजारों रुपये का योगदान भी दिया था। लेकिन जब देवता की शोभा यात्रा दलित बस्ती पहुंची तो अचानक रुख बदल गया। मात्र दो मिनट के अंदर देवता की मूर्ति को छीनकर ले जाया गया और पूजा नहीं कराई गई।

इसके बाद गांव के कुछ बड़े और युवा इकट्ठा हो गए और खुलेआम कहने लगे कि “उनके तो सिर्फ 15 घर हैं, वे क्या कर सकते हैं।” दलित समुदाय के सदस्यों का आरोप है कि इस दौरान उन्हें बुरी तरह गाली-गलौज की गई, जान से मारने की धमकियां दी गईं और अन्य ज्यादतियां भी की गईं।

दलित निवासियों ने यह भी कहा कि वे गांव की सार्वजनिक और धार्मिक आयोजनों के लिए टैक्स देते हैं और श्रमदान भी करते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश, देवता को छूने या बराबरी से पूजा करने की अनुमति नहीं दी जाती। गांव में लगभग 60 दलित परिवार हैं, जिनमें ज्यादातर कृषि मजदूर हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद दलित समुदाय के लोगों ने गांव में विरोध प्रदर्शन किया है और जिला प्रशासन से तुरंत कार्रवाई तथा मंदिर में समान अधिकार की मांग की है। उन्होंने सामाजिक कल्याण विभाग और स्थानीय अधिकारियों पर भी आरोप लगाया है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद कोई अधिकारी गांव नहीं पहुंचा है।