लखनऊ– बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में जातिवादी दमन और दलित-बहुजन छात्रों के उत्पीड़न का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। इतिहास विभाग के वरिष्ठ पीएचडी शोध छात्र बसंत कुमार कन्नौजिया को अनुशासनहीनता के आरोपों में निष्कासित किए जाने के बाद अब उनके शांतिपूर्ण धरने का समर्थन करने वाले छात्रों पर प्रशासन ने निलंबन की कठोर कार्रवाई शुरू कर दी है।
शुक्रवार को दो छात्रों – गौरव वर्मा और पवन भार्गव को 16 अक्टूबर की कथित घटना का हवाला देकर निलंबित कर दिया गया है, जबकि छात्र संगठन इसे प्रशासन की तानाशाही और डराने-धमकाने की रणनीति बता रहे हैं। इस बीच, कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया ने धरना स्थल का दौरा कर विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग की है, वहीं जर्मनी के अम्बेडकर कलेक्टिव गोटिंगेन जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से भी बसंत को व्यापक समर्थन मिल रहा है। कानपुर से छात्रसंघ बहाली मोर्चा ने समर्थन पत्र जारी किया जिसमें साफ चेतावनी दी है कि जो निर्णय पारदर्शिता, प्रमाण और न्याय पर आधारित नहीं है, वह निर्णय सिर्फ दमन है और दमन का हर कदम प्रतिरोध से टकराएगा। मोर्चा ने कन्नौजिया का निष्कासन तुरन्त रद्द करने, पूरी जांच सार्वजनिक करने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।
कन्नौजिया का लोकतांत्रिक आंदोलन 13वें दिन प्रवेश कर चुका है, लेकिन पुलिस की अनावश्यक मौजूदगी और दबाव ने मामले को और गंभीर बना दिया है।
इस पूरे विवाद की जड़ें सितंबर 2025 में परिसर में छात्र कल्याण से जुड़ी अशांति से जुड़ी हैं, जब एक जांच समिति ने बसंत कन्नौजिया को छात्रों को भड़काने, तोड़फोड़ और कुलपति कार्यालय में घुसपैठ के आरोप में मुख्य आरोपी ठहराया। 14 वर्षों से बीबीएयू में अध्ययनरत इस पहली पीढ़ी के दलित शोधार्थी का पूर्व रिकॉर्ड – जिसमें 2012 से 14 अनुशासनहीनता के मामले, शो-कॉज नोटिस और एफआईआर शामिल हैं – को आधार बनाकर अनुशासन समिति ने 7 और 9 अक्टूबर की बैठकों में निष्कासन की सिफारिश की।
उपकुलपति प्रो. राजकुमार मित्तल ने 17 अक्टूबर को जारी शो-कॉज नोटिस के जवाब को खारिज करते हुए 19 नवंबर को निष्कासन आदेश जारी कर दिया, जिसमें कन्नौजिया को परिसर प्रवेश और भविष्य की प्रवेश से वंचित कर दिया गया। कन्नौजिया ने हमेशा इन आरोपों को फर्जी बताते हुए कहा कि वे केवल छात्र हितों पर प्रशासनिक अधिकारियों से संवाद कर रहे थे और उनका संघर्ष अंबेडकारी विचारधारा को मजबूत करने और जातिगत भेदभाव के खिलाफ है। निष्कासन के तुरंत बाद उन्होंने संवैधानिक दायरे में शांतिपूर्ण धरना शुरू कर दिया, जो प्रशासनिक भवन के मुख्य द्वार पर केंद्रित है और अब 12 दिनों से अधिक चला आ रहा है। इस दौरान चेतावनी पत्रों का दौर चला, जैसे सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के छात्र शिवम कुमार को 21 नवंबर को जारी पत्र, जिसमें धरने में भागीदारी को 'परिसर में अशांति फैलाने' का दोषी ठहराया गया।
इस दमन के बीच राजनीतिक समर्थन भी उभर रहा है। पिछले कई दिनों से धरने पर डटे छात्रों से मिलने कांग्रेस के सांसद तनुज पुनिया धरना स्थल पहुंचे। उन्होंने कन्नौजिया के निष्कासन को "अमानवीय और जातिवादी" बताते हुए कहा कि यह शिक्षा संस्थानों में व्याप्त भेदभावपूर्ण सोच को उजागर करता है। पुनिया ने विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार से निष्पक्ष, समयबद्ध जांच की मांग की, ताकि बसंत कुमार कन्नौजिया को न्याय मिल सके। पुनिया का यह दौरा छात्रों के बीच उत्साह भरने वाला साबित हुआ, जहां उन्होंने एकजुटता का आह्वान किया और चेतावनी दी कि यदि पारदर्शिता नहीं आई, तो बड़ा आंदोलन छेड़ दिया जाएगा।
कन्नौजिया ने खुद सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने धरने के 12वें दिन की स्थिति का वर्णन किया। "आज हमारे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन का #बारहवां दिन है। लेकिन दुखद है कि विश्वविद्यालय परिसर में पुलिस की अनावश्यक मौजूदगी और दबाव बनाया जा रहा है, जबकि कानूनी रूप से परिसर के अंदर पुलिस की कोई सीधी भूमिका नहीं होती, जब तक कुलपति या विश्वविद्यालय प्रशासन औपचारिक रूप से बुलावा न दें," उन्होंने लिखा। संवैधानिक दृष्टि से अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) का हवाला देते हुए कन्नौजिया ने कहा कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण एकत्रीकरण के अधिकार का पूर्णतः शांतिपूर्वक प्रयोग कर रहे हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालय ज्ञान, संवाद और लोकतांत्रिक विचारों का स्थान होता है, जहां पुलिस दबाव शिक्षा के मूल चरित्र के विरुद्ध है। कानूनी रूप से केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पुलिस हस्तक्षेप केवल लिखित अनुरोध पर संभव है, और शांतिपूर्ण विरोध को रोकना सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के विरुद्ध है। "हम केवल न्याय, पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे हैं।"