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बॉम्बे हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी विवाद में मां के 'अधिकार जताने' पर जताई चिंता, कहा- माता-पिता दोनों का प्यार है जरूरी

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बच्चे की कस्टडी के मामले में सुनवाई करते हुए मां की अपने बच्चे पर अत्यधिक अधिकार जताने की भावना (पजेसिवनेस) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए माता और पिता, दोनों के प्यार और उपस्थिति का होना बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने पाया कि महिला ने अपने पूर्व के वादों और अदालती आदेशों की अनदेखी करते हुए पिता को अपने ही बच्चे से मिलने से रोका है।

जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि माता-पिता के विवाद के कारण बच्चे को मनोवैज्ञानिक के पास भेजना पड़ रहा है। जजों ने कहा कि यह स्थिति बहुत परेशान करने वाली है। अगर बच्चे को माता-पिता दोनों का साथ मिलता, तो शायद उसे कभी किसी मनोवैज्ञानिक की मदद की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और वह एक स्वस्थ इंसान के रूप में विकसित हो सकता था।

हाईकोर्ट ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा कि अपने शुरुआती और विकासशील वर्षों में एक बच्चा बिल्कुल वैसा ही बन जाता है, जैसा उसकी मां उसे ढालती है। अदालत के अनुसार, अगर मां बच्चे के मन में यह बात बैठा देती है कि पिता के साथ रहना उसके लिए सुरक्षित या अच्छा नहीं है, तो बच्चा उसी डर के साथ बड़ा होगा। उसके मन में पिता के प्रति हमेशा के लिए एक नकारात्मक भावना घर कर जाएगी।

यह महत्वपूर्ण फैसला पिता द्वारा 1 मई से शुरू हो रही गर्मियों की छुट्टियों के दौरान अपने बेटे से मिलने की अनुमति मांगने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए आया। अदालत ने पुराने घटनाक्रम का जिक्र करते हुए बताया कि मार्च 2025 में पिता ने अदालत से बच्चे से मिलने की गुहार लगाई थी। उस समय मां ने भी अपनी सहमति जताई थी, जिसके बाद अदालत ने पिता को हर रविवार सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्चे को अपने घर ले जाने की अनुमति दी थी।

पिछले साल मई में भी पिता को बच्चे के साथ 10 दिन बिताने की अनुमति दी गई थी, जिस पर मां आसानी से राजी हो गई थी। अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि जुलाई 2025 में पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) ने दंपति को एक संयुक्त पालन-पोषण योजना (जॉइंट पैरेंटिंग प्लान) पर आपसी सहमति बनाने की संभावना तलाशने का आदेश दिया था।

हालांकि, अदालत ने पाया कि मुलाकातों की इन व्यवस्थाओं का कड़ाई से पालन नहीं किया जा रहा था, क्योंकि मां लगातार पिता को बच्चे तक पहुंचने नहीं दे रही थी।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच चाहे जो भी विवाद हो, लेकिन इस स्तर पर बच्चे को दोनों का प्यार हर हाल में मिलना चाहिए। अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि मां रविवार को पिता से मिलने देने के अपने ही वचन से मुकर रही है। जजों ने चेतावनी दी कि मां जितना अधिक इस व्यवस्था का विरोध करेगी, बच्चा अपने पिता से उतना ही दूर होता चला जाएगा, और अदालत ठीक इसी स्थिति से बचना चाहती है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने पुरानी व्यवस्था को तुरंत बहाल करने का आदेश दिया, जिससे पिता हर रविवार अपने बेटे से मिल सकेंगे। इसके साथ ही, गर्मियों की छुट्टियों के लिए अदालत ने पिता को 15 से 20 मई और फिर 1 से 6 जून तक बच्चे को अपने साथ रखने की अनुमति दी है।

अदालत ने यह भी साफ किया कि जब बच्चा अपने पिता के पास होगा, तो मां फोन और वीडियो कॉल के जरिए उससे संपर्क में रह सकती है। मामले की अगली सुनवाई में अदालत एक संयुक्त पेरेंटिंग कार्यक्रम तैयार करने पर विचार करेगी।

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