नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी योग्य महिला का अपने पेशेवर करियर को आगे बढ़ाना और बच्चे के लिए स्थिर माहौल बनाना विवाह में "क्रूरता" या "परित्याग" नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों के उन निष्कर्षों को सिरे से खारिज कर दिया जिन्हें उसने "पिछड़ा" और "अति-रूढ़िवादी" करार दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि डेंटिस्ट के रूप में अपने करियर को जारी रखने के महिला के प्रयासों को तलाक का आधार बताना बिल्कुल गलत है। अदालत ने इस वैवाहिक विवाद में पारिवारिक अदालत और गुजरात हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को "सामंती" मानसिकता वाला बताया।
हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस अलग हो चुके जोड़े के तलाक को बरकरार रखा है। लेकिन यह फैसला पत्नी पर लगाए गए क्रूरता या परित्याग के आरोपों पर नहीं, बल्कि केवल विवाह के पूरी तरह से टूटने (इरिट्रीवेबल ब्रेकडाउन) के आधार पर लिया गया है।
यह मामला एक डेंटिस्ट पत्नी और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल पति से जुड़ा है, जिनकी शादी साल 2009 में हुई थी। शुरुआत में महिला अपने पति के साथ उनकी पोस्टिंग की जगह करगिल गई थी।
बाद में गर्भावस्था के दौरान महिला अहमदाबाद आ गई। उनकी बेटी को दौरे पड़ने (सीजर) से जुड़ी स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पैदा हो गई थीं। ऐसे में बेटी के विशेष इलाज और एक सुरक्षित माहौल के लिए महिला अहमदाबाद में ही रुक गई और वहां अपना एक डेंटल क्लीनिक भी स्थापित कर लिया।
इस मामले में पारिवारिक अदालत ने पति के पक्ष में तलाक मंजूर करते हुए कहा था कि पत्नी ने अपनी वैवाहिक जिम्मेदारियों से ज्यादा अपने करियर को तरजीह दी है। निचली अदालत का मानना था कि पत्नी जहां पति की पोस्टिंग हो वहां रहने के अपने अनिवार्य कर्तव्य में विफल रही। गुजरात हाईकोर्ट ने भी बाद में इस फैसले का समर्थन किया था।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला लिखते हुए जस्टिस मेहता ने स्पष्ट किया कि निचली अदालतों का ऐसा तर्क समाज की बहुत पुरानी और दकियानूसी मान्यताओं पर आधारित था, जो कानूनी रूप से बिल्कुल भी टिकने योग्य नहीं है।
पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, फिर भी एक योग्य महिला द्वारा अपने पेशेवर करियर को संवारने और बच्चे के सुरक्षित पालन-पोषण के लिए उठाए गए कदमों को अदालतों ने क्रूरता और परित्याग का नाम दे दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि शादी किसी भी महिला के व्यक्तित्व को खत्म नहीं करती है और न ही उसकी पहचान को उसके जीवनसाथी के अधीन करती है।
अदालत ने कहा कि यह बात स्पष्ट रूप से समझी जानी चाहिए कि एक उच्च शिक्षित और पेशेवर महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह खुद को केवल वैवाहिक दायित्वों की कठोर सीमाओं में बांध कर रखे।
न्यायाधीशों ने इस बात को भी रेखांकित किया कि वैवाहिक संबंधों में संतुलन बनाए रखना दोनों की साझा जिम्मेदारी है। कोई भी एक जीवनसाथी एकतरफा तरीके से दूसरे की जिंदगी के फैसले तय नहीं कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने महिला के खिलाफ झूठी गवाही (परजरी) का मुकदमा चलाने की पति की याचिका को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और महिला खुद अब सुलह में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है।
इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों द्वारा पत्नी के खिलाफ की गई सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को भी रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया।
निचली अदालतों के तर्कों को "बेहद चिंताजनक" बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिसे अवज्ञा के रूप में पेश किया गया, वह असल में महिला की अपनी स्वतंत्रता का दावा था। जिसे परित्याग का नाम दिया गया, वह वास्तव में पेशेवर प्रतिबद्धताओं, बच्चे की भलाई और जीवन की व्यावहारिक सच्चाइयों का परिणाम था।