+

न्यायिक फैसलों में नहीं होगा Ai का दखल: सुप्रीम कोर्ट की नई ड्राफ्ट गाइडलाइंस में कड़े नियम प्रस्तावित

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की एआई (AI) समिति ने अदालती कामकाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर सख्त रुख अपनाया है। नए प्रस्तावित नियमों के तहत, न्यायिक परिणाम तय करने में एआई के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने की सिफारिश की गई है। बिना मानवीय निगरानी के सजा सुनाने, गवाहों या पक्षकारों की प्रोफाइलिंग करने और किसी भी अदालती प्रक्रिया में 'अपारदर्शी' एआई सिस्टम के उपयोग को स्पष्ट रूप से वर्जित किया गया है।

बुधवार, 3 जून को 'अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उपयोग के लिए नियम, 2026' का प्रारंभिक ड्राफ्ट सार्वजनिक किया गया। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अदालती फैसलों में एआई पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंता जताई थी।

इसी साल मार्च में, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने एआई द्वारा उत्पन्न फर्जी फैसलों पर भरोसा करने के लिए एक निचली अदालत को भारी फटकार लगाई थी। शीर्ष अदालत ने इसे केवल 'निर्णय लेने में त्रुटि' नहीं, बल्कि गंभीर न्यायिक 'कदाचार' माना था।

इन नए नियमों के मसौदे में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि अदालती प्रक्रियाओं में उपयोग किए जाने वाले एआई सिस्टम केवल एक 'सहायक' के रूप में काम करेंगे। तकनीकी प्रणालियों को पूरी तरह से मानवीय निर्णय और न्यायिक अधिकार के अधीन ही रहना होगा। किसी भी परिस्थिति में तकनीक को न्यायाधीश का विकल्प नहीं माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा इस एआई समिति की अध्यक्षता कर रहे हैं। इस महत्वपूर्ण समिति में उनके साथ जस्टिस संजीव सचदेवा, जस्टिस राजा विजयराघवन वी., जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सूरज गोविंदराज शामिल हैं। समिति ने इन मसौदा नियमों को अंतिम रूप देने से पहले जनता और सभी हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए हैं। प्रतिक्रियाएं जमा करने की अंतिम तिथि 20 जून तय की गई है।

ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, एआई सिस्टम के माध्यम से व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' के प्रावधानों के तहत ही की जाएगी। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि एआई मशीनें नस्ल, धर्म, जाति, लिंग, जेंडर, विकलांगता, भाषा या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव को बढ़ावा न दें। संविधान द्वारा निषिद्ध किसी भी आधार पर तकनीकी पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नागरिकों के कानूनी अधिकारों या न्यायिक परिणामों की अखंडता से जुड़े उच्च जोखिम वाले मामलों में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू होंगे। ऐसे मामलों में स्वतंत्र निगरानी और मानवीय हस्तक्षेप अनिवार्य होगा।

मसौदे में यह भी चेतावनी दी गई है कि एआई समर्थित न्यायिक प्रणालियां 'डिजिटल डिवाइड' यानी तकनीकी असमानता को न बढ़ाएं। यह तकनीक ग्रामीण, आर्थिक रूप से कमजोर और भाषाई रूप से विविध समुदायों सहित सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए।

प्रस्तावित ड्राफ्ट केस प्रबंधन, सुनवाई का कार्यक्रम तय करने, अदालती कार्यवाही के ट्रांसक्रिप्शन और फैसलों के अनुवाद जैसे प्रशासनिक कार्यों के लिए एआई के उपयोग की अनुमति देता है।

हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि अदालती प्रक्रियाओं में 'रिस्क स्कोरिंग' के लिए इसका उपयोग बिल्कुल नहीं किया जा सकता। इसके तहत आरोपी के भागने के जोखिम का आकलन करना, अपराध दोहराने की भविष्यवाणी करना, जमानत की पात्रता जाँचना या गवाहों की विश्वसनीयता तय करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।

इसके अलावा, न्यायिक अधिकारियों, वकीलों, वादियों और अन्य संबंधित पक्षों की निगरानी के लिए भी एआई सिस्टम के उपयोग पर रोक लगाई गई है। जब तक कि लागू कानून द्वारा विशेष रूप से इस तरह की कार्यप्रणाली को अधिकृत न किया गया हो, तब तक तकनीक के जरिए किसी की भी जासूसी या सतत निगरानी नहीं की जा सकती।

न्यायपालिका में एआई को अपनाने, इसके लिए मानक तय करने और नीतिगत विकास का मार्गदर्शन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक पूर्णकालिक 'शीर्ष निकाय' बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह संस्था एआई से जुड़े सभी कामकाज की निगरानी करेगी और न्यायप्रणाली में इसके सुरक्षित एवं पारदर्शी उपयोग को सुनिश्चित करेगी।

इस शीर्ष निकाय के सदस्यों के चयन का स्पष्ट खाका तैयार किया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों को नामित किया जाएगा, जिनमें से एक पदेन अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे।

इसके अतिरिक्त, दो हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो हाई कोर्ट के न्यायाधीश, राष्ट्रीय महत्व के किसी संस्थान या ख्याति प्राप्त संस्था से एक सदस्य, एक वित्त विशेषज्ञ और एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ को भी मुख्य न्यायाधीश द्वारा ही नामित किया जाएगा।

इस समिति में भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में संयुक्त सचिव स्तर या उससे ऊपर के एक अधिकारी को भी शामिल किया जाएगा। साथ ही, प्रौद्योगिकी कानूनों और डेटा गोपनीयता के विशेषज्ञ वकील और राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षेत्र के प्रमुख प्रोफेसर भी इसका हिस्सा होंगे।

नियमों में यह प्रावधान भी किया गया है कि सीजेआई की पूर्व अनुमति से अनुसंधान संस्थानों या अकादमिक निकायों के अतिरिक्त विशेषज्ञों को भी इस निकाय में शामिल किया जा सकता है।

Trending :
facebook twitter