MP केन-बेतवा परियोजना आंदोलन! सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर की हिरासत से गरमाई राजनीति, आदिवासियों ने शुरू किया प्रदर्शन

11:36 AM May 13, 2026 | Ankit Pachauri

भोपाल। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर की हिरासत को लेकर बड़ा सियासी और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। मामला केवल एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह केन-बेतवा लिंक परियोजना, पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर एरिया, आदिवासियों के विस्थापन, मुआवजे और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ता नजर आ रहा है। अमित भटनागर लंबे समय से केन-बेतवा लिंक परियोजना और रुंझ डैम से प्रभावित आदिवासी परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे और वन अधिकारों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। इसी बीच सोमवार को जेल से रिहा होने के बाद उनके अचानक ‘लापता’ हो जाने की खबर सामने आई, जिसने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया।

अमित भटनागर के भाई अंकित भटनागर ने देर शाम एक वीडियो संदेश जारी कर पुलिस और जेल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि अजयगढ़ न्यायालय से जमानत मिलने के बाद जब वे अपने भाई को लेने जेल पहुंचे, तब उन्हें बताया गया कि अमित वहां मौजूद नहीं हैं। अंकित के मुताबिक, जेल प्रशासन ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी और बाद में पता चला कि पुलिस तथा वन विभाग की टीम अमित को जेल से रिहा होते ही अपने साथ ले गई थी। उन्होंने प्रशासन से सवाल किया कि यदि अमित को दोबारा गिरफ्तार किया गया था तो परिवार को इसकी औपचारिक सूचना क्यों नहीं दी गई। अंकित ने इसे “कानूनी प्रक्रिया के नाम पर अपहरण जैसी कार्रवाई” बताते हुए कहा कि रात के अंधेरे में किसी व्यक्ति को परिवार से छिपाकर रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।

कोर एरिया में प्रदर्शन को वन विभाग ने बताया गैरकानूनी

मामले ने तब और तूल पकड़ा जब पन्ना टाइगर रिजर्व के अधिकारियों ने पुष्टि की कि अमित भटनागर वन विभाग की हिरासत में हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) के डिप्टी डायरेक्टर बीके पटेल के अनुसार अमित भटनागर ग्रामीणों के साथ टाइगर रिजर्व के प्रतिबंधित ‘कोर एरिया’ ढोढन बांध क्षेत्र में प्रदर्शन कर रहे थे। विभाग का कहना है कि यह क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत अत्यंत संवेदनशील घोषित है और बिना अनुमति किसी भी प्रकार का प्रदर्शन, सभा या प्रवेश प्रतिबंधित है। अधिकारियों ने दावा किया कि कानून के अनुसार कार्रवाई की गई और परिवार को व्हाट्सएप के माध्यम से सूचना भेजी गई थी। साथ ही यह भी कहा गया कि थाने में अमित की मोबाइल पर परिजनों से बात कराई गई और बाद में उन्हें नियमानुसार न्यायालय में पेश किया गया।

हालांकि, आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वन विभाग परियोजना विरोधी आवाजों को दबाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि जिन ग्रामीणों की जमीन, जंगल और आजीविका प्रभावित हो रही है, उनकी बात सुनने के बजाय प्रशासन दमनात्मक कार्रवाई कर रहा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि कोर एरिया का हवाला देकर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को सीमित किया जा रहा है।

PCC चीफ जीतू पटवारी पन्ना पहुँचे

अमित भटनागर की कथित गुमशुदगी और आदिवासियों पर कार्रवाई की खबर फैलते ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पन्ना पहुंचे। प्रशासन ने उनके काफिले को भूसौर नाका पर रोक दिया, जिसके बाद उन्होंने वैकल्पिक रास्ते से आंदोलन स्थल तक पहुंचने की कोशिश की। बताया जा रहा है कि जीतू पटवारी और यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष अभिषेक परमार समर्थकों के साथ बाइक से जंगल के रास्ते प्रतिबंधित ढोढन बांध क्षेत्र पहुंचे और वहां आदिवासियों से मुलाकात की।

आदिवासियों के बीच पहुंचकर जीतू पटवारी ने राज्य सरकार और वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासियों की जमीन और जंगल छीन रही है तथा विरोध करने वालों को अपराधी की तरह ट्रीट किया जा रहा है। पटवारी ने अमित भटनागर की हिरासत को अलोकतांत्रिक बताते हुए उनकी तत्काल रिहाई की मांग की। इसके बाद पन्ना टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने जीतू पटवारी, अभिषेक परमार और अन्य समर्थकों के खिलाफ भी वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया। इस कार्रवाई के बाद मामला पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है।

राजनीतिक बयानबाजी के बीच आंदोलन स्थल पर मौजूद आदिवासी महिलाओं का दर्द सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। ग्रामीण महिलाओं ने स्थानीय समाचार पत्र से बातचीत में साफ कहा कि उनकी प्राथमिकता किसी राजनीतिक दौरे से अधिक अमित भटनागर की रिहाई है। पलकुआ निवासी शीला आदिवासी ने कहा कि जीतू पटवारी आए जरूर, लेकिन उनकी असली मांगों पर कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। उन्होंने कहा, “उन्होंने पेड़-पौधों और जंगल की बात की, लेकिन हमें न्याय नहीं मिला। हमें तो सिर्फ हमारे अमित भाई साहब चाहिए। उनके बिना कोई आंदोलन खत्म नहीं होगा।”

एक अन्य महिला मुन्नी आदिवासी ने कहा कि गांव के लोग कई दिनों से भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमारी पहली और आखिरी मांग अमित भाई साहब को बाहर निकालने की है। जब तक वे वापस नहीं आएंगे, हम यहां से नहीं हटेंगे और अन्न-पानी भी ग्रहण नहीं करेंगे।” महिलाओं के इन बयानों ने आंदोलन को भावनात्मक और मानवीय आयाम भी दे दिया है।

विस्थापन, मुआवजा और पुनर्वास को लेकर बढ़ रहा असंतोष

दरअसल, पूरा विवाद केन-बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दे से जुड़ा है। प्रभावित आदिवासी और किसान लगातार आरोप लगा रहे हैं कि मुआवजा सर्वेक्षण पारदर्शी नहीं है और बिना उचित प्रक्रिया के मुआवजा राशि निर्धारित की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि जिन जमीनों और जंगलों पर उनकी पीढ़ियां निर्भर रही हैं, उनके बदले मिलने वाला मुआवजा नाकाफी है। साथ ही अब तक पुनर्वास की स्पष्ट और भरोसेमंद नीति सामने नहीं आई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि कई परिवारों को अब तक यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि उन्हें कहां बसाया जाएगा, खेती और रोजगार की व्यवस्था कैसे होगी और जंगल आधारित जीवनशैली खत्म होने के बाद उनका भविष्य क्या होगा। आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी समुदायों को उनकी सहमति के बिना विस्थापित किया जा रहा है, जो वन अधिकार कानून और संवैधानिक प्रावधानों की भावना के खिलाफ है।

आंदोलन से प्रदेशव्यापी मुद्दा बनने की ओर बढ़ा विवाद

अमित भटनागर की गिरफ्तारी, जीतू पटवारी पर दर्ज प्रकरण और लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शन ने इस विवाद को अब स्थानीय मुद्दे से आगे बढ़ाकर प्रदेशव्यापी राजनीतिक संघर्ष का रूप दे दिया है। अमित भटनागर की रिहाई और प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा देने की मांग को लेकर एसपी कार्यालय का घेराव किया जा चुका है। वन विभाग अन्य प्रदर्शनकारियों की पहचान करने में जुटा है, जबकि आदिवासी संगठनों और किसान समूहों ने आंदोलन तेज करने के संकेत दिए हैं।