कानपुर- देश में आम आदमी जब न्याय की आस में सरकारी तंत्र और प्रशासन की दहलीज पर दस्तक देता है, तो अक्सर उसे चरम मजबूरी में पहुंचकर ही अपनी बात मनवानी पड़ती है।
बीते दिनों ओडिशा में एक गरीब आदिवासी बुजुर्ग जीतू मुंडा को अपनी मृत बहन का कंकाल कंधे पर लादकर बैंक पहुंचना पड़ा था, सिर्फ इस सबूत के लिए कि उनकी बहन की मौत हो चुकी है और अब उनके खाते में जमा 19 हजार रूपये उसे मिल जाए। घटना अभी पुरानी हुई नहीं थी कि अब कानपुर में एक आईटीबीपी जवान विकास सिंह अपनी मां का कटा हुआ हाथ लेकर पुलिस कमिश्नरेट पहुंचने को मजबूर हुआ ताकि मेडिकल लापरवाही की शिकायत पर कोई सुनवाई हो।
दो अलग-अलग राज्यों, दो अलग घटनाएं, लेकिन दर्द एक ही- सिस्टम की उदासीनता।
कानपुर में हुई इस दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) का एक जवान विकास सिंह अपनी मां का कटा हुआ हाथ थर्माकोल के डिब्बे में लेकर तीन दिनों तक न्याय की गुहार लगाता रहा। देश की सीमाओं की रक्षा करने वाला सैनिक अस्पतालों की कथित लापरवाही और पुलिस की उदासीनता के खिलाफ इस हद तक मजबूर हो गया कि वह मां के कटे हाथ को सबूत के रूप में लेकर थाने-कमिश्नरी के चक्कर काटने लगा। इस हृदयविदारक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर तूफान मचा दिया है और लोगों में गुस्सा व दर्द दोनों पैदा कर दिया है।
जवान विकास सिंह के अनुसार उनकी मां को सांस लेने में तकलीफ हुई तो उन्हें शुरू में पारस अस्पताल ले जाया जा रहा था। रास्ते में तेज दर्द के कारण उन्हें टाटमिल स्थित कृष्णा अस्पताल में भर्ती कराया गया। परिवार का आरोप है कि यहां इलाज के दौरान लापरवाही बरती गई, जिससे मां के हाथ में गंभीर संक्रमण फैल गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें फिर पारस अस्पताल रेफर किया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि संक्रमण बहुत बढ़ चुका है और जान बचाने के लिए दाहिना हाथ काटना पड़ेगा। 17 मई को मां का हाथ सर्जरी से काट दिया गया।
A heartbreaking and deeply disturbing scene from Kanpur has left people across the country shocked wherein an Indo-Tibetan Border Police soldier is seen carrying his mother’s severed hand for three days while desperately seeking justice.
— Hate Detector (@HateDetectors) May 19, 2026
The soldier alleges that his mother lost… pic.twitter.com/RHCLQvdaFh
सर्जरी के बाद भी परिवार की मुसीबत खत्म नहीं हुई। विकास सिंह ने बार-बार रेल बाजार थाने में कृष्णा और पारस अस्पताल के खिलाफ मेडिकल नेग्लिजेंस की शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। निराश होकर उन्होंने मां का कटा हुआ हाथ फ्रीजर में संरक्षित रखा और आखिरकार पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए। वहां रोते हुए उन्होंने कहा, “साहब, ये मेरी मां का कटा हुआ हाथ है। कोई सुन नहीं रहा था।” यह दृश्य देखकर कमिश्नरेट में हड़कंप मच गया। आईटीबीपी जवान के इस संघर्ष ने स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल खड़े कर दिए।
इस मामले में व्यापक आक्रोश के बाद कानपुर पुलिस कमिश्नरेट ने तुरंत संज्ञान लिया। पुलिस ने कहा कि आईटीबीपी जवान विकास सिंह ने डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (पूर्व) से मुलाकात की। इसके बाद कानपुर नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को दोनों अस्पतालों- कृष्णा अस्पताल और पारस अस्पताल की भूमिका की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। तीन सदस्यों की एक जाँच कमेटी भी बनाई गयी है और जाँच रिपोर्ट आने पर आगे कारवाई होगी।
पुलिस ने कटे हुए हाथ की फॉरेंसिक जांच के भी आदेश दे दिए हैं। सभी मेडिकल रिकॉर्ड और इलाज की प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
जवान विकास सिंह 32वीं बटालियन आईटीबीपी महाराजपुर में तैनात हैं और फतेहपुर जिले के खागा हथगाम क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनके बटालियन में भी इस घटना पर गुस्सा है।
सोशल मीडिया पर इस खबर ने आग की तरह फैलते हुए हजारों प्रतिक्रियाएं बटोरी हैं। लोग लिख रहे हैं- “देश की रक्षा करने वाला सैनिक अपनी मां के लिए इतना मजबूर हो जाए, ये शर्मनाक है।” कई ने स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने और निजी अस्पतालों पर सख्त निगरानी की मांग की है। कुछ ने पूछा कि बिना इस हद तक पहुंचे शिकायत पर सुनवाई क्यों नहीं होती?
यह मामला न सिर्फ मेडिकल नेग्लिजेंस का है, बल्कि आम आदमी की मजबूरी और सिस्टम की नाकामी का भी प्रतीक बन गया है। जहां एक तरफ जवान सीमा पर दुश्मन से लड़ता है, वहीं दूसरी तरफ घर में अपने प्रियजन के लिए लड़ाई लड़ रहा है।