वाशिंगटन डीसी: भारतीय दूतावास में गूंजे बाबा साहेब के विचार, गौरव जे. पठानिया ने संविधान को बताया 'पवित्र दस्तावेज'

10:55 AM Nov 29, 2025 | Pratikshit Singh

वाशिंगटन डीसी: भारतीय संविधान की 76वीं वर्षगांठ के अवसर पर वाशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया । इस अवसर पर आयोजित समारोह में वक्ता के तौर पर शामिल हुए गौरव जे. पठानिया ने संविधान की विशेषताओं और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को साझा किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक वादा और कला का एक बेजोड़ नमूना है।

राजदूत विनय क्वात्रा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में संविधान की मूल प्रति की कला और सुलेख (Calligraphy) पर एक प्रदर्शनी भी लगाई गई।

संविधान: कला और कड़े परिश्रम का संगम

Trending :

अपने संबोधन में गौरव पठानिया ने संविधान के निर्माण से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भारत का मूल हस्तलिखित संविधान 251 पन्नों का एक सुंदर ग्रंथ है, जिसे पार्चमेंट पेपर पर लिखा गया है।

इसकी सुलेखन प्रक्रिया की बारीकियों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि सुलेखक (Calligrapher) प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने इसे लिखने के लिए इंग्लैंड और चेकोस्लोवाकिया से मंगवाई गई 303 नंबर की निब वाले 432 पेन होल्डर्स का उपयोग किया था। इसके पन्नों को शांतिनिकेतन के कलाकारों ने नंदलाल बोस के निर्देशन में सजाया था, जो भारत की सभ्यतागत विरासत को दर्शाता है।

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व: बुद्ध से मिली प्रेरणा

भाषण का मुख्य आकर्षण डॉ. अंबेडकर के दर्शन पर केंद्रित रहा। पठानिया ने याद दिलाया कि प्रस्तावना के तीन प्रमुख शब्द- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality, and Fraternity)- डॉ. अंबेडकर के लिए केवल राजनीतिक नारे नहीं थे, बल्कि गहरे नैतिक मूल्य थे।

उन्होंने डॉ. अंबेडकर के 1954 के रेडियो संबोधन का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ये तीन सिद्धांत फ्रांसीसी क्रांति से उधार नहीं लिए गए थे, बल्कि ये भगवान बुद्ध की शिक्षाओं से प्रेरित थे। उन्होंने कहा, "बुद्ध ने इन तीनों सिद्धांतों को एक साथ रखा था, और इसी सामंजस्य ने अंबेडकर के न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक भारत के दृष्टिकोण को आकार दिया"।

व्यक्ति की गरिमा से ही राष्ट्र की एकता

संबोधन में 'बंधुत्व' (Fraternity) के महत्व पर विशेष जोर दिया गया। पठानिया ने बताया कि संविधान सभा में यह चर्चा हुई थी कि क्या "राष्ट्र की एकता" को "व्यक्ति की गरिमा" से पहले रखा जाना चाहिए। लेकिन डॉ. अंबेडकर ने इसे अस्वीकार कर दिया था।

अंबेडकर का मानना था कि राष्ट्र की एकता ऊपर से थोपी नहीं जा सकती; यह प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और अधिकारों से ही संभव है। पठानिया ने कहा, "हम एक राष्ट्र इसलिए हैं क्योंकि हम प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा के प्रति साझा प्रतिबद्धता रखते हैं"।

संविधान को 'पवित्र ग्रंथ' मानने की अपील

भाषण के अंत में, उन्होंने भारतीय समाज में आ रहे एक सकारात्मक बदलाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज भारत में युवा जोड़े संविधान की शपथ लेकर विवाह कर रहे हैं। यह प्रतीक दर्शाता है कि नई पीढ़ी संविधान को पढ़ रही है और उसे अपने जीवन का हिस्सा बना रही है।

उन्होंने 1955 में डॉ. अंबेडकर द्वारा संविधान को "पवित्र दस्तावेज" (Sacred document) कहे जाने का संदर्भ देते हुए कहा कि इसने उन लाखों लोगों को गरिमा वापस दी, जिन्हें सदियों से इससे वंचित रखा गया था।

अंत में, उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे संविधान को केवल याद न करें, बल्कि इसे जिएं और डॉ. अंबेडकर के इन शब्दों को याद रखें: "हम सबसे पहले और सबसे आखिरी में भारतीय हैं"।